Sunday, October 29, 2017

कविताएं।


सत्या और सावित्री।।।।

कभी सोच सकता है 
कोई माँ बाप
अरमानों को ढाठी और
जीते जी मौत की की सजा
उसका अपना ही खून देगा
हुआ है यही उस माँ बाप के साथ
लगा दिया जीवन  की पूँजी
जिस बाप का उजड़ गया भविष्य
बेटा का भविष्य संवारने में
उसी बाप को दण्ड.......
बाप  माँ को औलाद का
हर दर्द रुलाता है
तेरा भी दर्द रुलाता था
तुम्हें तो याद नहीं होगा
बरामदे की सीढ़ी से जब तू गिरा था
नाक से तुम्हारी कुछ कतरा लहू का बहा था
गुप्ता आंटी तुमको अस्पताल लेकर गयीं थी
बदनसीब बाप तुम्हारी मरणासन्न माँ को 
अस्पताल,
आंखों में आंसू लेकर........
वो विपत्ति के दिन थे तुम्हारे बाप के लिए
माँ का साँस रुकते रुकते चल पड़ी थी
यह तुम्हारे बाप के लिये नया जीवन था
मुसीबत के दिनों तुम्हे तुम्हारे बाप ने
कोई तकलीफ़ नहीं होने दिया
बड़की बहन तुम्हारी चेतन थी
तुमसे थोड़ी सी अधिक
छोटका तो बोल भी नहीं पाता था
समझता था अधिक 
अपनी माँ की अवदशा और 
बाप की दुर्दशा से अवगत था
तुम्हारी बड़की बहन कैसे बाप का हाथ बटाती थी
तुमको दूर रखती थी ताकि बचा रहे हर बला से.....
तू भूल गया होगा कितने दुर्दिन थे 
वो दिन तुम्हारे माँ बाप के लिए
तुम्हारी बहन तुमको कैसे खिलाती थी
कैसे सुलाती थी,कैसे नहलाती थी
खुद भी तैयार होती थी, 
तुमको लेकर स्कूल जाती
सबसे छोटका पड़ोसियों के हवाले होता था
तुम्हारा बाप पहले अस्पताल फिर दफ्तर
लंच टाइम में अस्पताल और 
तुम बच्चों की देखरेख यही दिनचर्या थी
उसके खाने सोने तक को वक्त नहीं था....
तुमको इतना तो याद ही होगा
छोटका बाप को देखते कितना ,
उदास हो जाता था
रात में जब बाप सोता था तो 
वही गले मे हाथ डाल कर सोता था
तुमको यह भी मालूम होगा क्यो
क्योंकि तेरा बाप को तुम नन्हे मुन्नों को
खिला पिला,सुलाकर अस्पताल जो
 जाना होता था
जहाँ बिस्तर पर पड़ी
जीवन मृत्यु से संघर्षरत
तेरी माँ राह देखती तुम बच्चों का
कुशलक्षेम जानने के लिए......
बकरी कसाई चिकित्सक की गलती ने
जीवन भर के लिए दर्द तो दिया
पर तुम लोगों को देख कर
तुम्हारे माँ ही नहीं
दादा दादी, काका काकी तक झूम उठते थे
तुम खानदान के पहले अभियंता हुए
तुम्हारे बाप ने तुम्हारा ब्याह
दहेज़ रहित करने का वादा किया था
पूरे खानदान ने साथ भी दिया था
तुमने बाप की मदद तो नही किया
हाँ ससुराल वालों की किया
शायद यही तुम्हारे कर्ज़दार होने की
पुख्ता वजह  होगी........
वाह रे बेटा कटप्पा दुल्हन के आते ही
दुल्हन और उसके माँ बाप के गुलाम हो गये
चूल्हा अलग कर ,माँ बाप को 
गुनाहगार बना कर 
जहर पिला दिया
वाह रे सास ससुर के वफादार कटप्पा
माँ बाप के अरमानों का कत्ल कर दिया
जीते जी मार दिया
दुल्हनियां और उसके माँ बाप के 
काले जादू के मायाजाल में फंसकर
बेटा कटप्पा तू जहां भी रह खूब तरक्की कर
बूढ़े माँ बाप जी लेंगे छोटके की अंगुली पकड़कर
तू माँ बाप के जनाजे में भी नही आएगा
तब तेरे मृत माँ बाप की आत्मा को कोई
तकलीफ नही होगी
हाँ छोटका अभी पांव जमाने लायक
हुआ नहीं हैं हो जाएगा
छोटका जब सचमुच छुटका था
माँ बाप के दर्द को समझता था
तनिक बडा होकर अधिक समझता है
छोटका छोटा ही सही
सहारा बनता है, माँ बाप के दर्द पर
रो पड़ता है,
हे भगवान तू अगर है तो छोटके को
सफल और संपन्न बना दे ताकि
बूढ़े माँ के जीने का ठोस सहारा बन सके।
जा कटप्पा जा,हो जा नजरो से दूर
खून के कतरे को विखंडित करने वाली
मन से अंधी पगली,तुम्हे भ्रम के जाल में
फंसाकर
परिवार के टुकड़े टुकड़े करने वाली 
आज की कैकेयी को लेकर 
सत्या और सावित्री जी लेंगे
छोटके की अंगुली पकड़कर ।।।।

डॉ नन्दलाल भारती
19/08/2017










भला कौन बदनसीब
सोच सकता है,
उम्र भर पीया ज़हर
संघर्षर रहा, जिसके लिए 
वही पर आते ही
मौत की दुआ करेंगे
यही कर रहे खून के कतरे
सोचा जो हो नहीं रहा वो
हो रहा वही जो सोचा न था
 कभी,
खुद के लहू का कतरा
मौत मुकर्रर करेगा 
कौन सोच सकता है
अपना,अपना ही सपना
तबाह कर देगा
तपस्या के बदले मौत का 
पैगाम 
फिर भी सलामती मे उनकी
उठते है हाथ,
बेमुरव्वत, बेदर्द वे जो नहीं
खड़े होते साथ
वाह रे अपनी जहाँ के माँ बाप
ढो लेते है औलाद का घाव।।।

डॉ नन्दलाल भारती
17/08/2017









।।।। मजबूरी ।।।

माँ-बाप क्या होते हैं ?
 धरती के भगवान
बेटे कहां समझते हैं
माँ-बाप सब कुछ
समझ जाते हैं
कुल के उध्दारक 
और भी बहुत कुछ
बेटे जो कुछ नहीं समझते
माँ बाप बेटे की
वाह-आह-सांस तक के
मर्म को समझ लेते हैं
बेटे अब माँ-बाप के
आंसू तक को नहीं समझते
माँ बाप के अरमानों का
कर देते हैं क़त्ल
जीते जी देते हैं मार
माँ-बाप क्या चाहते हैं
खुद के लिये तनिक छांव
खूब तरक़्क़ी  बेटे के लिए
 दृढ़ इच्छा के लिए
कभी सेतु तो कभी पहाड़
बनते रहे
कभी खुद को गिरवीं रखते हैं
सिर्फ बेटे की तरक्की के लिये
हाँ माँ-बाप की एक और
होती है ख्वाहिश अपने लिए
इसी लिए माँ बाप हर दर्द
सह लेते हैं
हर विष पी लेते हैं
वह ख्वाहिश इतनी सी है
बेटे के कंधे पर अंतिम यात्रा
इसी ख्वाहिश के लिए 
सहते है, दुःख-दर्द ज़िल्लत भी
कुछ माँ बाप को यह भी
नहीं नसीब होता
पांव जमते ही कुछ निर्मोही
बेटे छोड़ देते माँ -बाप को
दुनिया छोड़ने से पहले 
माँ बाप मजबूर हो जाते हैं
जी कर भी मरने के लिये ।।।।
डॉ नन्दलाल भारती
15/08/2017








।।आज़ादी का जश्न।।
आज़ादी का जश्न पंद्रह अगस्त है
राष्ट्र दुलारे
राष्ट्र के प्रति स्व निश्चित हो
कर्तव्य हमारे
बच्चे जवान बूढ़े भी वीर जवान
हो जाये
दुश्मन आंख तरेरे जब
तान कर छाती खड़े हो जाये
देखना दुश्मन पीठ दिखा देगा
जब हम देश और संविधान पर
मरना मिटना सीख जाएं
क्या दलित क्या आदिवासी
क्या हिन्दू क्या बौद्ध क्या जैन
क्या सिक्ख क्या मुसलमान
क्या ईसाई
समता, सदभावना कुसुमित रहे सदा
शांति समानता, राष्ट्र प्रेम का गूंजे नारा
जाति धर्म भेद की ना उठे चीख 
एकता सर्वधर्म सद्भभावना
 सबका साथ सबका विकास हो
उद्देश्य हमारा,
पंद्रह अगस्त आज़ादी का जश्न
आभा निराली जहाँ में बढ़ जाये
देश अपना जान से देश का मान
सारे जहाँ में बढ़ जाये
सर्वधर्म समानता चहुमुखी विकास के
पुष्प खिले नित नव नव
खुश्बू से जहां महक जाये
आजादी का जश्न पंद्रह अगस्त
अमर शहीदों का बलिदान
आओ प्यारे आज़ादी का जश्न
हंसी खुशी मनाएं
अमर शहीदों की विरासत आज़ादी
अमर रहे
भारत माता की जयकार लगाएं।।।
डॉ नन्दलाल भारती
13/08/2017

Saturday, October 28, 2017

कविताएं

बरखूरदार हमारी फिक्र ना किया करना
 फिक्र मे हमारी ना वक्त जाया करना,
तुम अपने  सपनों को पूरा करना
हां फर्ज़ को भी ना विस्मृत करना
तुम्हारे सपने हमारी उम्र हैं
सांसे भी हैं भरना
तुम हमारी खबर भी नहीँ लोगे
सच मानो हमे कोई अफसोस
नहीं होगा
गर कोई खबर होगी हमारी तो
तुम तक पहुंच ही जाएगी
तुम खुद को परेशां ना करना
हम तो गैर हैं बरखूरदार
हमारी खबर लेकर क्या करना ?????
इतना एहसान जरूर करना
वक्त मिल जाये गर तो
अपनी खबर जरूर दे दिया करना ।।।।।।
डॉ नन्दलाल भारती
15/09/2017














राहें कहाँ आसान हैं
चलना है शूल पर भी
पूरे होश मे 
रिसते जख्म से उपजे
दर्द को पीकर भी
पार करना है जो
जातिवादी चक्रव्यूह को 
खींचना है पाषाण के वक्ष पर
होने के अपने कुछ सबूत
खप रही है
चक्रव्यूह मे संघर्षरत शोषित की
अनमोल जिन्दगी
जातिवादी दुनिया का जीवन
कांटों का जीवन है
हारना नहीं जीतना है
जीना है समतावादी जीवन
गढना है पुरुषार्थ की तस्वीरे
लिखना है तकदीरें
आसान नहीं पर नामुमकिन भी नहीं
बुध्द की भूमि आओ हाथ बढाओ
इंसानियत की राह सबसे है सही।।।।
डॉ नन्दलाल भारती
12/09/2017

















सुना है श्राद्ध पक्ष चल रहा है
यानि 
पुरखों के तर्पण का वक्त
विरोधाभास कितना भारी है
मरे हुए को खुश करने का
खोखला प्रपंच
ढकोसले के सिंहासन पर
सुशोभित कर
किसी गैर को खुश करने के बहाने
अपने मृतक को खुश करने का
भरम
क्या है ये मरम ?
मरे हुए कि  आत्मा को 
खुश करने के लिए नाना प्रकार के व्यंजन
हो रहे खूब दान धरम
ये कैसा रिवाज है
मरे हुए के नाम पर भारी भोज
दिखावा दान धरम रोज
दूसरी ओर जीवित माता पिता
कहने को धरती के भगवान
ना भर पेट रोटी ना आश्रय
आंसू पीकर खुद को पोस रहे
वक्त को कोस रहे
जीते जी मर रहे रोज
अरे अपनी जहां वालों
बहुत हुआ ना करो पाखंड
अब तो बदल दो अपनी सोच
रखो ध्यान जीवित माता पिता की
पलकें ना हो गीली 
उन्हें तनिक ना सताना
मान दो सम्मान दो उनको
वही है तुम्हारे जीवनदाता
और 
धरती के जीवित भगवान।
डॉ नन्दलाल भारती
10/09/2017





इंसान रिश्तों की डोर मे बधकर 
कर जाता है पार जिन्दगी की
हर मुश्किलें
रिश्ते जीवन को उम्र देते हैं
जीने के हौशले भी
रिश्ते ही होते है
रिश्ते के निश्छल बहाव से
गढ जाती है अमर तस्वीरे
बन जाती है जो दुनिया के लिये नजीरें
रिश्ते ही तो है जीवन के लिए
आक्सीजन
मौत के सौदागर जाने अनजाने
रिश्तेदार का धारण कर लेते हैं 
चोला
बहुरूपिये यही 
लहूलुहान कर देते हैं रिश्ते की मीनारें
खींचवा देते हैं
खून के रिश्ते के बीच तलवारें
रिश्तों के बीच अमानुषों का प्रवेष
ढहा देता है 
रिश्ते की मीनारें और
बेमौत मार देता है सपने
पराये हो जाते है अपने
रिश्ते मर्यादा को बचाना होगा
बहुरूपिओ को पहचानना होगा
रिश्ते की आन मान बचाये
रिश्ते को जीवन का ध्येय बनायें।
डॉ नन्दलाल भारती
09/09/2017




 






।।। ओणम ।।।

ओणम अखण्ड भारत के,
चक्रवर्ती महाराजा बलि को
याद करने का दिन
स्मृतियों को नमन करने का दिन
यादों का उत्सव मनाने का दिन
महाराजा बलि के प्रति आस्था
व्यक्त करने का दिन
गौरव गाथा को ,
नमन करने का दिन
समता और मानव कल्याण के
आह्वान का दिन
अखण्ड भारत के मूलनिवासी
चक्रवर्ती महाराजा के 
पुनर्अवतरित होने की 
कामना का दिन
सुखद समतावादी राज के
स्थापना के मन्नत का दिन
आओ करें कामना
मूलनिवासी महाराजा के
राज की फहराये पताका
भारत भूमि का हो
बलि महाराजा
ओणम अपनी जहां का 
होवै मंगलदिन
महाराजा बलि के राज की होवे
पुर्नस्थापना
शुभकामना, जीवन का हर दिन हो
मंगलकारी शुभ दिन..............
.......Happy Onam ......
डॉ नन्दलाल भारती
04/09/2017
बंगलौर










उसूल रहे जीने के सहारे अपने
टूटते बिखरते उम्मीदों के सपने
लगता डूबेगी नैया दूर होगें सपने
दुआओं के हाथ बनते पतवार अपने
उसूलों पर जीना दर्द होते भारी सहने
अपने होते विरोधी गैरों के क्या कहने
डंटे रहे उसूलों पर दूर होते स्वार्थी अपने
ना टूटा उसूल कुसुमित हुए सपने
दर्द भयंकर शूल रहे जो सगे अपने
उसूल की जम़ीं पर बोये जो सपने
ना धन दौलत ना साथ जाते पूरे सपने
हर हाल पुलकित होते जग मे अपने
हाय रे मतलब के भूखे खडे होते
उसूलों के खिलाफ देते आंसू
तोडते सपने।।।।।।।।
डॉ नन्दलाल भारती
03/09/2017




















जब तक हूँ तब तक हूँ
जानता हूँ
ना मेरे जनाजे में भारी 
भीड़ होगी
 ना पक्की कब्र होगी
ना चौराहे पर ताकती मूरत
यक़ी है वे लोग साथ होंगे
लोग जो साथ थे
सकूं होगा आत्मा को
गम होगा उन्हें ना होने का
यही मुट्ठी भर लोग
मुझे तो नहीं ज़िंदा कर सकेंगे
उसूलों को ढोते रहेंगे
जो हमने ढोया
जो कुछ सीखा था सीया था
लिया था वही वापस किया
चल  दिया अनन्त यात्रा पर 
लोग हमारे निकाल दिए
अंतिम यात्रा
यही जीवन है आना जाना
पाना और खो जाना
पंचतत्व में विलीन निगाहें
तुम्हे ढूढ़ती रही पर तुम थे 
गैरहाजिर जनाजे से भी
 तुमसे कोई उम्मीद भी  न थी
कई बार  भोंक चुके थे खंजर
भले तुम ना मानो 
मुझे तुम्हारी फिक्र सदा रही
दुआ है तुम्हारे लिए
उन्नति,-सदबुद्धि मिले तुम्हे और 
तुम चलते रहो लोककल्याण के पथ
आखिरी सांस तक
भेदभाव रहित समता संग
यही होगा मोक्ष तुम्हारे लिए
तुम्हारे होने की सफलता
और
तुम्हारे न होने का अफसोस भी जमाने को।।
डॉ नन्दलाल भारती
21/08/2017




कविताएं

जिन्दगी हर पल इम्तिहान  ले रही है
अपनी जहां रंज सी हो रही है
सोचा था बगिया मे 
बहार आएगी
सींचे थे बड़े जतन से
ना सोचा कभी अपनी जहां
बैरी हो जाएगी
खुली आंखों मे बसे सपने
अफसाने हो रहे
मायानगरी, अपने भी
बेगाने हो रहे
ना जाने किस गुनाह की सजा
ये अपनी जहां वालो खुश रहना
भले ही अपने
सपनों की बारात लूट रही है
जिन्दगी पल पल इम्तिहान ले रही है।
डॉ नन्दलाल भारती
12/10/2017







अजीब जिन्दगी के मायने हैं
समझने पर भी समझ से दूर
निकल जाते हैं
उम्मीद को वक्त के बवंडर
छिन ले जाते हैं
पस्त हो जाते हैं अरमान
हौशले बिखर जाते हैं
जिन्दगी के मोढ पर अपने भी
गैर हो जाते है
कोई आंसू देता है कोई शूल
कोई विष बीज बो जाता है
अजीब हैं जिन्दगी के मायने
जीने के बहाने मिल जाते हैं।
डॉ नन्दलाल भारती
24/09/2017








।।।।।। कैसी मजबूरी।।।।।
ये कैसी सल्तनत है
जहां शोषितों को आंसू
अमीरों को रत्न धन मोती,
मिलते हैं,
शोषितो के नसीब दुर्भाग्य
बसते हैं
पीडित को दण्ड शोषक को
बख्शीश क्या इसी को
आधुनिक सल्तनत कहते हैं
ये कैसी सल्तनत है
जहाँ अछूत बसते हैं........
दर्द की आंधी जीवन संघर्ष
अत्याचारी को संरक्षण
निरापद को दण्ड यहां
हाय. रे बदनसीबी
जातिवाद, अत्याचार,चीर हरण
हक पर अतिक्रमण, छाती पर
अन्याय की दहकती अग्नि
विष पीकर भी देश महान
कहते हैं
ये कौन सी सल्तनत मे
सांस भरते हैं.....................
श्रमवीर,कर्मठ, हाशिये के लोग
अभाव,दुख,दर्द मे जी रहे
खूंटी पर टंगता हल, 
हलधर सूली पर झूल रहे
महंगाई की फुफकार 
आमजन सहमे सहमे जी रहे
अभिव्यक्ति की आजादी लहूलुहान
कलम के सिपाही मारे जा रहे
चहुंओर से सवाल उठ रहे
कैसी सल्तनत ,लोग
भय आतंक के साये मे जी रहे......
बढ रहा है खौफ़ निरन्तर 
जातिवाद का भय भारी
जातिविहीन मानवतावादी 
समाज की कोई ले नहीँ रहा जिम्मेदारी
जातिवादी तलवार पर सल्तनत है प्यारी
इक्कीसवीं सदी का युग पर,
छूआछूत ऊंच नीच का आदिम युग है जारी
इक्कीसवीं सदी समतावादी विकास का युग
जातिवाद रहित जीवन जीने का युग
हाय रे सल्तनत तरक्की से दूर
जातिवाद का बोझ ढो रहे
हम कौन सी सल्तनत मे
जीने को मजबूर हो रहे........।
हाय रे सल्तनत बस मिथ्या
शेखी
कभी, बाल विवाह, गरीबी, शिक्षा के
दिन पर गिरते स्तर,बेरोजगारी,स्वास्थ्य
जातीय उत्पीडन,घटती कृषि भूमि
घटती खेती किसानों की मौत पर
सामाजिक जागरण या कोई बहस देखी
अपनी जहाँ वालों आधुनिक सल्तनत
हमसे है हम सल्तनत से नही
ऐसी क्या मजबूरी है कि मौन
सब कुछ सह रहे
सल्तनत कि जय जयकार कर रहे...........
डॉ नन्दलाल भारती
17/09/2017

कैसा शहर(कविता)
ये कैसा शहर है बरखुरदार
ना रीति ना प्रीति
धोखा, छल फरेब,षड़यंत्र
ये कैसे लोग कैसा तन्त्र
मौत के इन्तजाम, छाती पर प्रहार
ये कैसा शहर है बरखुरदार......
ये कैसा शहर,आग का समंदर
डंसता घडिय़ाली व्यवहार
पारगमन की आड़ मे अश्रुधार
रिश्ते की प्यास , जड मे जहर
हाय रे  पीठ मे भोकता खंजर
पुष्प की आड़ ,नागफनी का प्रहार
ये कैसे लोग हैं बरखुरदार...........
मन मे पसरा बंजर ,तपती बसंत बयार
जश्न के नाम करते घाव का व्यापार
छल स्वार्थ के चबूतरे ,दिखावे के जश्न
जग हंसता,चक्रव्यूह मे रिश्ते वाले प्रश्न
छल,भय,जादू से ना जुड़ सकती प्रीत
ना कर अभिमान, ना पक्की जीत
धोखे से असि का ना कर प्रहार
बदनाम हो जाओगे बरखुरदार......
ना लूट सपनों की टकसाल
ना कर मर्यादा पर वार
तेरा भी लूट जायेगा एक दिन संसार
आंसू दिये जो , मिलेगा तुम्हें गुना हजार
कैसे मानुष जिह्वा पर विष,मन मे कटार
युग बदला तुम ना बदले कैसे तुम, कैसा शहर ?
कैसी रीति कैसी प्रीति कैसा लोकाचार
रिश्ते को ना करो बदनाम बरखुरदार.......
डॉ नन्दलाल भारती
16/09/2017








हमारी फिक्र ना किया करना
 फिक्र मे हमारी ना वक्त जाया करना,
तुम अपने  सपनों को पूरा करना
हां फर्ज़ को भी ना विस्मृत करना
तुम हमारी खबर भी नहीँ लोगे
सच मानो हमे कोई अफसोस
नहीं होगा
गर कोई खबर होगी हमारी तो
तुम तक पहुंच ही जाएगी
तुम खुद को परेशां ना करना
हम तो गैर हैं बरखूरदार
हमारी खबर लेकर क्या करना ?????
इतना एहसान जरूर करना
वक्त मिल जाये गर तो
अपनी खबर जरूर दे दिया करना ।।।।।।
डॉ नन्दलाल भारती
15/09/2017

Friday, October 27, 2017

कविता ःःखूबसूरत मिजाज

कविता :खूबसूरत मिजाज
खूबसूरत मिजाज की चाह मे
सदियों से खौफ़ और
बेचैनी में बसर कर रहा है दलित
हर पल भय और आशंका के
अंवारा बादलों से घिरा रहता है
दलित.......
जातिवाद, शोषण, अत्याचार,
नरसंहार के भय से डरा-सहमा
आशंकित रहता है दलित
सदियों के तनाव का दु:स्वप्न
आंखों मे ठहरने नहीं देता
यकीन
आज भी हाशिये पर पड़ा
सुरक्षित राह ताक रहा है
दलित.......
मूलनिवासियों के पूर्वजों की कभी 
सदियों पूर्व सत्ता थी
तब भारत सोने की चिड़िया था
आज भूमिहीन, अछूत, गरीब
और कहा जा रहा दलित.....
ये वही देश है,
कभी गुनगुनाता था, 
आहो हवा मदमस्त थी
बसंत बयार बहती थी हरदम
गुंजती थी फिजां मे मानो शहनाई
वही उदासी की धुन बहती है अब
आतंकित रहता है दलित........
ये वही भारत है
जिसकी रगो मे बहती थी
समता, मानवता न्याय और 
निश्छल प्रेम की अविरल धारा
आज उसी देश के दिल पर
बरसते हैं बेरुखी के नस्तर
दिल से रिसता रहता है 
अविराम लहू
मूलनिवासी बना दिया गया है
दयनीय दलित.....
भारत जो सोने की चिड़िया था
वही  चाहता है पुरानी पहचान अब
जीना चाहता है समतावादी
खूबसूरत मिजाज की 
बसंतमयी आबो-हवा मे भी  दलित......

डॉ नन्दलाल भारती
28/10/2017

कविता : दलित


दलित क्या है जानते हो ?

हाँ क्यों नहीं,

सरकारी दमाद है दलित......

नहीं नहीं गलत समझ रहे

दलित मतलब होता है दर्द

पुराने जख्म से झरता दर्द

दलित नहीं जानता कौन मुसीबत

कब बरस पड़े.....

कब कोई दबंग थेसर मे पीस दे

कब कोई सडक़ पर नंगा कर दे

कब दलित मां बहन को

कौन अमानुष बेआबरू कर दे

कब कोई हको पर कब्जा कर ले

कैद नसीब का मालिक निरापद

दलित नहीं जानता........

वह जानता है तो देश पर कुर्बान होना

देश की मांटी तो पुरखों की माटी है

दलित के लिए

दलित अनुरागी  दर्द मे जी रहा है

अपनी धरती आसमान की आशा मे

कैद मुकदर के दर्द का विषपान कर.....

दलित का दर्द जश्न बन जाता है

धर्म और सत्ता की चौपड़ पर

सत्ता से उठा तनिक शोर तनिक भर मे

मौन हो जाता है

धर्म से उठा शोर खड़ा कर देता है

फजीहत......

दलित के हाथ लगता है तो

मरते सपनों का बोझ

सिमटती दुनिया मे नहीं बदल रही

तथाकथित उंचों की सोच.....

दलित आरक्षित नहीं तनिक संरक्षित है

आरक्षित तो वे हैं

जो सर्वश्रेष्ठता नकाब ओढे

लूट रहे हैं पोथी का भय दिखाकर

दान- धर्म के नाम पर गुमराह कर......

पसीना बहाता है, सृजन हाथोँ मे रखता है

भय भूख मे रहता है

निरापद को जातीय विषधर,

दलित कहता है....

दलित दहकता सुलगता, भभकता

दर्द होता है

दलित का दर्द सर्वश्रेष्ठता का मुखौटा

लगाए लोग कैसे समझ सकते हैं ?

दलित दर्द मे जीने का नाम है

लहू को पानी बनाकर

अपनी जहाँ सींचने का नाम है दलित

हाशिये पर सदियों से पडा है दलित

हाड़फोड़कर भूख मिटा लेता है दलित

अपनी जहां मे सम्मान का

 भूखा है दलित।

डॉ नन्दलाल भारती

27/10/2017

Thursday, December 15, 2016

कुत्ता/लघुकथा

कुत्ता/लघुकथा

भाभी धनतेरस के दिन उदास क्यूँ।
भइया की याद आ रही होगी सुमित्रा बोली।
कुत्ता भूँक गया भईया।।घर से दूर है तो याद आएगी ही पापी पेट का सवाल है, वरना घर परिवार से क्यूँ दूर जाते, उनकी अनुपस्थिति में कुत्ता वक्त बेवक्त भूँकता रहता है।
कुत्ता के भूँकने का इतना गम ?
भइया दो पांव वाला कुत्ता ।
मतलब आदमी ।
जी सही समझे।
वो कुत्ता कौन है भाभी।
पड़ोस में।
क्या ?
हां ।।।देखो ना सड़क पर बॉल्कनी बना रखा है, ट्यूबेल सड़क के मध्य है इतना ही नहीं हमारे गैरेज की तरफ इतनी बड़ी खिड़की खोल रखा है।मेरे घर के सामने गाड़ी धोता है।अंदर बाहर कीचड़ हो जाता है।हमारे घर के सामने कार खड़ी करने के लिए लड़ाई करता है।हमारे पेडो का दुश्मन बन बैठा है ।कहता है हम तुम लोगो को चार साल से झेल रहे हैं।
ये पडोसी तो सचमुच पागल कुत्ता है सुमित्रा बोली।
डॉ नन्द लाल भारती
15/12/2016

Saturday, November 19, 2016

नोट बंदी का दर्द।।

।। नोट बंदी का दर्द।।
आजकल लाचार हो गया हूँ
खिस्से में कुछ नोट तो हैं
इतने में कुछ दिन पहले
महीने भर का राशन
ला सकता था
हाय रे नोट बंदी
उसी नोट के बदले
एक वक्त की रोटी नहीं
नसीब हो रही है
बैंक की लाईन में
एक दिन चला गया
ए टी एम पर लंबी लंबी
लाईने लगी है
समझ में नहीं आ रहा है
काम पर जाऊं
या बैंक या ए टी एम की लाईन में लगूँ
परदेसी हूँ हिंदी भाषी हूँ
दफ्तर से क्वार्टर और क्वार्टर से दफ्तर
सिलसिला जारी है
जरूरतों का गला घोंटने के अलावा
और कुछ नहीं है मेरे पास
कुछ दिन ऐसे ही चली राजनीति की असि
तो हम और हमारे जैसे लोगों का
जीवन आ जाएगा संकट में
संकट से उबरने का कोई
रास्ता नजर नहीं आ रहा है
मन रो रो कर सवाल कर रहा है
क्या नोटबंदी काले को सफ़ेद
करने का खेल है
आमआदमी को भूखे बेमौत मारने की
कोई गुप्त योजना
खिस्से में नोट तो है
एक चाय की हैसियत नहीं है
हाय रे राजनीतिक बाहबाही
बिना किसी तैयारी के
लेकर नोटबंदी के फैसले
आम आदमी को भूखे
मरने को मजबूर कर दिया
चहुओर हाहाकार है
आम आदमी कितना लाचार है
क्या खाऊं, कहाँ जाऊँ
समझ नहीँ पा रहा हूँ नोटबंदी है या मौत का पैगाम
सच नोटबंदी से लाचार हो गया हूँ।
डॉ नन्द लाल भारती
18/11/2016