अमर गीत...
गंगाजल सरीखे आँखों के
पानी का मोल
आदमी रूप खुदा का
मन की गहराई से तोल।
बहते आंसू को पोंछ
कमजोर के काम आया जो
जगाया जज्बात देव तुल्य
सच्चा इंसान है वो ।
मर मिट जायेगे सब
पीछे भी तो यही हुआ ,
किया काम कल्याण का
आदमी वही खुदा हुआ ।
माया के हुश्न
तरबत्तर दीन को सताया
वक्त ने दुत्कारा
ना कभी ज़माने को
याद आया ।
वक्त ने बिन पानी की
मीन सा तड़पाया
तानाशाहों ने भी
कफ़न तक नहीं पाया ।
आदमी खुदा का रूप उजियारा
उठे हर हाथ चिराग
मिटे हर अँधियारा ।
कृष्ण किये उध्दार
राम हुए पुरुषोत्तम
महावीर अहिंसा, बुध्द ने जलाई
समता की ज्योति सर्वोत्तम
कबीर ,रविदास के शब्द
ललकार रहे
गूंज रही मीरा की धुनें
वाहे गुरु अनुराग रहे ।
ध्रितराष्ट्र को जग धिक्कार रहा
ईसा बुध्द के आदर्शो को
जग मान रहा ।
ना तडपे भविष्य
ना आँखे अब रोये
लिख दो अमर गीत भारती
समय के आरपार जगवाले गाएं..........नन्द लाल भारती ..१५.०५.2011
Sunday, May 15, 2011
Friday, May 6, 2011
बेगाना
बेगाना ...
झोली भर दे
क्यों हुआ बेगाना ,
दहकता पाषाण सा
मन ना मन ।
कर्तव्य दूर कोसो
स्वार्थ सवार हो गया ,
तुमसे उम्मीद औरो से
ना उम्मीद हो गया ।
ऊँची मंजिले ना खजाने की चाह
नेक अरमानो का पूरन
समता की आस ।
योहि दिन बितता
मै पिछड़ता गया ,
यादो की बारात
संग
सिसकता रह गया ।
था क्या दोष
आखिर में रखा गया ,
कर्मवीर शूरवीर,
अधिकार वंचित रह गया ।
उम्मीद तुमसे ना
बिसार पाओगे
बुध्द के वेश में
तुम जरुर आओगे ।
भेद भरी दुनिया में
समता बस जायेगी
ज़माना वैकुण्ठ
सा
फलित हो जाएगा ।
भारती रोये निहार-निहार
भेद भरा जमाना
अब तो झोली
भर दो
क्यों हुआ बेगाना .............नन्द लाल भारती
झोली भर दे
क्यों हुआ बेगाना ,
दहकता पाषाण सा
मन ना मन ।
कर्तव्य दूर कोसो
स्वार्थ सवार हो गया ,
तुमसे उम्मीद औरो से
ना उम्मीद हो गया ।
ऊँची मंजिले ना खजाने की चाह
नेक अरमानो का पूरन
समता की आस ।
योहि दिन बितता
मै पिछड़ता गया ,
यादो की बारात
संग
सिसकता रह गया ।
था क्या दोष
आखिर में रखा गया ,
कर्मवीर शूरवीर,
अधिकार वंचित रह गया ।
उम्मीद तुमसे ना
बिसार पाओगे
बुध्द के वेश में
तुम जरुर आओगे ।
भेद भरी दुनिया में
समता बस जायेगी
ज़माना वैकुण्ठ
सा
फलित हो जाएगा ।
भारती रोये निहार-निहार
भेद भरा जमाना
अब तो झोली
भर दो
क्यों हुआ बेगाना .............नन्द लाल भारती
Sunday, May 1, 2011
सुलगते रिश्ते
सुलगते रिश्ते ...
घात-प्रतिघात स्वार्थ का
विषैला रोग ,
वक्त की बेवफाई
सम्पति का बढ़ता मोह ।
आंसुओ की गवाही
ना
रहती अब याद
क्या कर्म क्या फ़र्ज़
स्वार्थ का
गहराता दरिया ।
अस्मिता का उपहास
परिश्रम का परिहास
रिश्ते की सिकुडन
संबंधो का तलाक
ना थे कभी ऐसी आस
और के हक़ से
नजदीकी
नाक नोचने की बात
वाह रे जमाना
ऐसे रिह्तो की नित
झरती बरसात
चक्रव्यूह स्वार्थ का
बढ़ती ध्रितराष्ट्र की तादात
अंध गूगा बहरा वक्त
अनगुंज फ़रियाद ।
यादो के जंगल में
नित बहता हादसा
स्वार्थ बस
आशियाना रिश्तो का
सुलगता ,
वाह रे
रिश्तो का करिश्मा
न तेल न बाती
सदा जलता रहता .....नन्द लाल भारती
घात-प्रतिघात स्वार्थ का
विषैला रोग ,
वक्त की बेवफाई
सम्पति का बढ़ता मोह ।
आंसुओ की गवाही
ना
रहती अब याद
क्या कर्म क्या फ़र्ज़
स्वार्थ का
गहराता दरिया ।
अस्मिता का उपहास
परिश्रम का परिहास
रिश्ते की सिकुडन
संबंधो का तलाक
ना थे कभी ऐसी आस
और के हक़ से
नजदीकी
नाक नोचने की बात
वाह रे जमाना
ऐसे रिह्तो की नित
झरती बरसात
चक्रव्यूह स्वार्थ का
बढ़ती ध्रितराष्ट्र की तादात
अंध गूगा बहरा वक्त
अनगुंज फ़रियाद ।
यादो के जंगल में
नित बहता हादसा
स्वार्थ बस
आशियाना रिश्तो का
सुलगता ,
वाह रे
रिश्तो का करिश्मा
न तेल न बाती
सदा जलता रहता .....नन्द लाल भारती
Thursday, April 28, 2011
सर्वधर्म ...
सर्वधर्म ॥
सर्वधर्म सदभाव की अलख
जगाने दो ,
द्वेष-विद्रोह अब मिट जाने दो ,
परमार्थ की ज्योति
जलाने दो,
सर्वधर्म के गीत गाने दो .............
दिल में नव एहसास
घर कर जाने दो ,
पूरे देश को एक हो
जाने दो
नैतिकता के राह जाने दो
सर्वधर्म के गीत गाने दो .............
भेद की सारी दीवारे
ढह जाने दो
मन-भेद की खाई
पट जाने दो
सदभाव के फूल
खिल जाने दो
सर्वधर्म के गीत गाने दो .............
सुख-दुःख धुप-छांव को
एक हो जाने दो
शांति का सुख बरस
जाने दो
सर्वकल्याण की प्रीति
निभाने दो
सर्वधर्म के गीत गाने दो .............
हर दिल में सदप्रेम की
आग लग जाने दो
मन गंगा जमुना सा
हो जाने दो
राष्ट्र -धर्म की बात
बढ़ जाने दो
सर्वधर्म के गीत गाने दो .............
हर देवालय से देश-हित का
आगाज हो जाने दो
सर्व शांति-सर्व सुख की लहर
दौड़ जाने दो
वसुधैव कुटुम्बकम की
ज्योति जलाने दो
सर्वधर्म के गीत गाने दो .............
भेद की दीवार तोड़
मानवता को विह्स
जाने दो ,
गिरिजाघर से हरिकीर्तन की
धून उठ जाने दो
मंदिर से अजान
मस्जिद से
इश्वर अल्लाह तेरे नाम का
उदघोष हो जाने दो
सर्वधर्म के गीत गाने दो .............नन्द लाल भारती
सर्वधर्म सदभाव की अलख
जगाने दो ,
द्वेष-विद्रोह अब मिट जाने दो ,
परमार्थ की ज्योति
जलाने दो,
सर्वधर्म के गीत गाने दो .............
दिल में नव एहसास
घर कर जाने दो ,
पूरे देश को एक हो
जाने दो
नैतिकता के राह जाने दो
सर्वधर्म के गीत गाने दो .............
भेद की सारी दीवारे
ढह जाने दो
मन-भेद की खाई
पट जाने दो
सदभाव के फूल
खिल जाने दो
सर्वधर्म के गीत गाने दो .............
सुख-दुःख धुप-छांव को
एक हो जाने दो
शांति का सुख बरस
जाने दो
सर्वकल्याण की प्रीति
निभाने दो
सर्वधर्म के गीत गाने दो .............
हर दिल में सदप्रेम की
आग लग जाने दो
मन गंगा जमुना सा
हो जाने दो
राष्ट्र -धर्म की बात
बढ़ जाने दो
सर्वधर्म के गीत गाने दो .............
हर देवालय से देश-हित का
आगाज हो जाने दो
सर्व शांति-सर्व सुख की लहर
दौड़ जाने दो
वसुधैव कुटुम्बकम की
ज्योति जलाने दो
सर्वधर्म के गीत गाने दो .............
भेद की दीवार तोड़
मानवता को विह्स
जाने दो ,
गिरिजाघर से हरिकीर्तन की
धून उठ जाने दो
मंदिर से अजान
मस्जिद से
इश्वर अल्लाह तेरे नाम का
उदघोष हो जाने दो
सर्वधर्म के गीत गाने दो .............नन्द लाल भारती
Tuesday, April 26, 2011
आहुति
आहुति ॥
भविष्य से हुई जंग का
हारा हुआ
सिपाही हो गया हूँ ।
जनाजा निकल चुका है
मेरे सपनों का
बचा भी क्या है ?
मेरे पास कुछ नहीं
बस
कुछ मीठा दर्द ,
कुछ यादे
और
शब्दों का भरापूरा
संसार।
शब्दों कि नईया में
बैठकर
पार कर लेता हूँ
बड़ी-बड़ी तूफानी
राते।
कुछ विचलित
सा
हो गया हूँ
नकाबपोशो की भीड़ में ।
कही और न छल ले
किसी अमानुष का
स्वार्थ
अथवा
कोई और
मानवता विरोधी साजिश ।
मन आहत हो गया है ,
भविष्य क्षत -विक्षत भी ।
खौफजदा रहने
लगा हूँ ,
भविष्य के आईने में
झांक कर ।
चाहता हूँ
किसी गरीब का
सपना
ना उजड़े ।
आओ पत्थरो के
शहर में
बूत बने लोगो पर
संवेदना के फुहार
कि डाले
आहुति
ताकि
संवर सके
दीन हीन का भविष्य ......नन्द लाल भारती
भविष्य से हुई जंग का
हारा हुआ
सिपाही हो गया हूँ ।
जनाजा निकल चुका है
मेरे सपनों का
बचा भी क्या है ?
मेरे पास कुछ नहीं
बस
कुछ मीठा दर्द ,
कुछ यादे
और
शब्दों का भरापूरा
संसार।
शब्दों कि नईया में
बैठकर
पार कर लेता हूँ
बड़ी-बड़ी तूफानी
राते।
कुछ विचलित
सा
हो गया हूँ
नकाबपोशो की भीड़ में ।
कही और न छल ले
किसी अमानुष का
स्वार्थ
अथवा
कोई और
मानवता विरोधी साजिश ।
मन आहत हो गया है ,
भविष्य क्षत -विक्षत भी ।
खौफजदा रहने
लगा हूँ ,
भविष्य के आईने में
झांक कर ।
चाहता हूँ
किसी गरीब का
सपना
ना उजड़े ।
आओ पत्थरो के
शहर में
बूत बने लोगो पर
संवेदना के फुहार
कि डाले
आहुति
ताकि
संवर सके
दीन हीन का भविष्य ......नन्द लाल भारती
Friday, April 22, 2011
गाँव के निवासियों
गाँव के निवासियों ....
मेरे अपने गाँव के निवासियों
गाँव कि धरती
अर्थात जमीं का स्वर्ग
जहा जन्म लेने का
गौरव मिला हमको ।
जहा सूरज पहले लेकर आता है
रोशनी
चाहे जीतनी गरीबी रही हो
सोंधापन समाया रहा
जमीं में यहाँ।
बुराईया अब गाँव कि राह
पकड़ने लगी है
घर-घर में फूट बढ़ने लगी है ।
काम -धंधा का टोंटा
पड़ने लगा है
प्रजातंत्र के ज़माने में
श्वेत खोटा लगाने लगा है ।
गाँव अब टूट रहा है ,
देश कि आत्मा ठगा-ठगा
लग रहा है
आजमगढ़ क्या
देश विदेश के रोजनामचे पर
छपती रहती है
गाँव कि खबरे ।
वही गाँव जहा से चला
मोटा धन ऊँचा ओहदा
हवा कि राह तक चला।
गाँव कि दुर्दशा ग्रामीणों के पलायन
रोजगार कि कमी
भूमिहीनता बेहद का चलन
ये काफी है
चहरे पर कालिख पोतने के लिए ।
समाज सेवको देश भक्तो से
गुजारिस है मेरी
कुछ तो कीजिये तरक्की से दूर
राह जोह रहे गाँव के लिए ।
क्या गाँव के लिए
प्रभारी नियुक्त नहीं
किया जा सकता
माप सके जो विकास को
कर सके
खिलाफत कुव्यवस्थाओ
जातीपाती कि बुराईयों का ।
गावं के सामाजिक आर्थिक
विकास का ढूंढ सके उपाय
बची रहे
अस्मिता रोजगार का हो सृजन ।
ग्रामीण विकास के लिए
ढूढिये कोइ दागरहित
सुयोग प्रभारी महान
भले ही ना रहा हो
नाता गाँव से
ढूढिये गाँव कि बुराईयों के दमन
और
कल्याण के लिए
मुखबिर कि भांति
गाँव कि सेवा के लिए
आजीवन मै
उपलब्ध रहूँगा श्रीमान ...........नन्दलाल भारती
मेरे अपने गाँव के निवासियों
गाँव कि धरती
अर्थात जमीं का स्वर्ग
जहा जन्म लेने का
गौरव मिला हमको ।
जहा सूरज पहले लेकर आता है
रोशनी
चाहे जीतनी गरीबी रही हो
सोंधापन समाया रहा
जमीं में यहाँ।
बुराईया अब गाँव कि राह
पकड़ने लगी है
घर-घर में फूट बढ़ने लगी है ।
काम -धंधा का टोंटा
पड़ने लगा है
प्रजातंत्र के ज़माने में
श्वेत खोटा लगाने लगा है ।
गाँव अब टूट रहा है ,
देश कि आत्मा ठगा-ठगा
लग रहा है
आजमगढ़ क्या
देश विदेश के रोजनामचे पर
छपती रहती है
गाँव कि खबरे ।
वही गाँव जहा से चला
मोटा धन ऊँचा ओहदा
हवा कि राह तक चला।
गाँव कि दुर्दशा ग्रामीणों के पलायन
रोजगार कि कमी
भूमिहीनता बेहद का चलन
ये काफी है
चहरे पर कालिख पोतने के लिए ।
समाज सेवको देश भक्तो से
गुजारिस है मेरी
कुछ तो कीजिये तरक्की से दूर
राह जोह रहे गाँव के लिए ।
क्या गाँव के लिए
प्रभारी नियुक्त नहीं
किया जा सकता
माप सके जो विकास को
कर सके
खिलाफत कुव्यवस्थाओ
जातीपाती कि बुराईयों का ।
गावं के सामाजिक आर्थिक
विकास का ढूंढ सके उपाय
बची रहे
अस्मिता रोजगार का हो सृजन ।
ग्रामीण विकास के लिए
ढूढिये कोइ दागरहित
सुयोग प्रभारी महान
भले ही ना रहा हो
नाता गाँव से
ढूढिये गाँव कि बुराईयों के दमन
और
कल्याण के लिए
मुखबिर कि भांति
गाँव कि सेवा के लिए
आजीवन मै
उपलब्ध रहूँगा श्रीमान ...........नन्दलाल भारती
Tuesday, April 5, 2011
आदमी अकेला है
आदमी अकेला है ॥
अपनी ही खुली आँखों के
ख्वाब
डसने लगे है
अकेला है जहा में
फुफकारने लगे है
फजीहत के दर्द पीये
जख्म से वजूद सींचे
भूख पसीने से धोये
सगे अपनो के लिए
जिए है ।
वक्त हँसता है
ख्वाब डराता है
कहता है
जमाने की भीड़ में
अकेला है
कैसे मान लू
हाड निचोड़ा किया-जिया
सगे अपनो के लिए
क्या वे अपने
सच्चे नहीं ?
अपनो के सुख-दुःख की
चिंता में डूबा रहा
खुद के अपनो की ना थी
फिकर
खुद की आँखों के सपने
धुल गए
अपने-सपने
सगो में समा गए ।
सच है
त्याग सगे
अपनो के लिए
गैर-अपनो के लिए
क्या किये ?
कर लो विचार
मंथन का वक्त है
सच कह रहा
वक्त
आदमी अकेला है
दुनिया का साजो-श्रींगार
झमेला है ।
सगे अपनो के लिए
दागा-धोखा
गैर के हक़ लहू से
किस्मत लिखना ठीक नहीं
मेहनत-सच्चाई -ईमानदारी से
सगे अपनो की नसीब
टांके चाँद तारे
दुनिया का दस्तूर है
प्यारे
गैरों की तनिक करे
फिकर
दान-ज्ञान-सत्कर्म हमारे
वक्त के आरपार
साथ निभाते
जमाने की भीड़ में
हर आदमी अकेला
ध्यान रहे हमारे ....नन्द लाल भारती
अपनी ही खुली आँखों के
ख्वाब
डसने लगे है
अकेला है जहा में
फुफकारने लगे है
फजीहत के दर्द पीये
जख्म से वजूद सींचे
भूख पसीने से धोये
सगे अपनो के लिए
जिए है ।
वक्त हँसता है
ख्वाब डराता है
कहता है
जमाने की भीड़ में
अकेला है
कैसे मान लू
हाड निचोड़ा किया-जिया
सगे अपनो के लिए
क्या वे अपने
सच्चे नहीं ?
अपनो के सुख-दुःख की
चिंता में डूबा रहा
खुद के अपनो की ना थी
फिकर
खुद की आँखों के सपने
धुल गए
अपने-सपने
सगो में समा गए ।
सच है
त्याग सगे
अपनो के लिए
गैर-अपनो के लिए
क्या किये ?
कर लो विचार
मंथन का वक्त है
सच कह रहा
वक्त
आदमी अकेला है
दुनिया का साजो-श्रींगार
झमेला है ।
सगे अपनो के लिए
दागा-धोखा
गैर के हक़ लहू से
किस्मत लिखना ठीक नहीं
मेहनत-सच्चाई -ईमानदारी से
सगे अपनो की नसीब
टांके चाँद तारे
दुनिया का दस्तूर है
प्यारे
गैरों की तनिक करे
फिकर
दान-ज्ञान-सत्कर्म हमारे
वक्त के आरपार
साथ निभाते
जमाने की भीड़ में
हर आदमी अकेला
ध्यान रहे हमारे ....नन्द लाल भारती
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