Friday, January 20, 2012
हाशिये के आदमी का जीवन
हो गया है
कटी पतंग जैसा ,
कैसे-कैसे लोग
तरक्की के पहाड़
चढ़ रहे ,
दौलत के मीनार
रच रहे
हाशिये का आदमी
पसीना बहता
रोटी आंसू से गीला करता
उपेक्षित जस का तस
तरक्की से दूर फेंका
बाट जोह रहा
देखो दगाबाजो को
दिन दुनी रात चौगुनी
तरक्की कर रहे
देशी रकम से विदेश पाट रहे
हाशिये के आदमी की
उम्मीदों का खून कर रहे
अरे हाशिये के लोगो
अब तो कर दो ललकार
शादियों से क्यों
टुकुर-टुकुर ताक रहे ..नन्द लाल भारती १३.०१.२०१२
भ्रमकांड
शरंड जलौका के कर
मारते रहे सपने
खुद चढते रहे शिखर .
अदने करते रहे
जीने के अभ्यास
सींचते रहे सपने
रेंग-रेंग कर .
शरंड के विष बाण
जलौका का मीठा जहर
कमजोर के नसीब पर
बरसाते रहे कहर .
लूटी नसीब अदने होते गए
बेनूर और तरक्की से भी दूर
फिर क्या चली ऐसी हवा
शरंड और जलौका के खिलाफ
ना कर सका कोई बाल बांका
ये भ्रम कांड खूब रुलाया
अदानो का ध्यान
चींटियों कि ओर गया
अब क्या अदने भी
टूट पड़े
छीन लिए अपना हक़
शरंड और जलौका के जबड़े से
जो था सदियों से दूर .......नन्द लाल भारती ...१४.०१.२०१२
डन्वरूआ
पहरेदारी के बीच से
निकाल लाया था कश्ती
संघर्ष और तालीम की
पतवार के सहारे......
किनारे लगती कश्ती
संघर्ष और तालीम यौवन पाते
उसके पहले दन्वरुऊआ /danwarooaa के
योध्दाओं ने
बोल दिया हमला
कश्ती तार-तार हो गयी
लहुलुहान हुआ मैं भी
कश्ती डूब रही है
और मैं सवार हूँ
सद्कर्म पर विश्वाश के सहारे
क्योंकि संघर्ष और तालीम के
प्रारब्ध
दन्वरूआ /danwarooaa
ख़त्म नहीं कर सकते
हमारे .............नन्द लाल भारती १६.०१.२०१२
वक्त की करवट
इंसान कि तस्वीर कितनी
पिछली से मेल खाती नहीं
आज की तस्वीर अपनी ................
आदमी है कि पद-दौलत
उंच-नीच-अमीर-गरीब की
गांठे बांधे पड़ा है ,
और
अभिमान की तलवार पर खड़ा है
खुद को कहता बड़ा है ........
लहूलुहान कर छाती पर चढ़
आगे निकालने में लगा है
अंधी दौड़ का हथियार
जातिवाद-धर्मवाद-क्षेत्रवाद-भा
बना लिया है .
इन सब के बाद भी वक्त को
धोखा कहा दे पाया है कि आज दे पायेगा ...
एक दिन सारे हथियार फेल हो जाते है
उम्र भी साथ छोड़ने को आतुर हो जाती है
गुमानी चारो-खाना चित हो जाता है
शरंड,जलौका सभी अभिमानी
गिड़ गिडाते है
आंसू बहाते है
गुनाह,अपराध करनी पर अपनी
चेतो खुदा के बन्दे है
भले ही बूढ़ी हो जाए सूरत अपनी
वक्त के गाल पर उजली तस्वीर
टँगी रहे अपनी.................नन्द लाल भारती .. १७.०१.2012
बदल गयी नियति
आज के आदमी की
गैर के सुख को देख
दुखी होने लगे हैं
लोग ...............
वो बुध्द थे वो महावीर
आदमी के दुःख से
कितने दुखी हुए थे
निकल पड़े थे
दुनिया के सुख के लिए
दुःख दर्द में खुशियाँ
कांटने वाले वंशज
और
कहाँ गए वे लोग ..............
दर्द का रिश्ता होता है
सबसे बड़ा
आज जख्म को खुरच कर
दर्द उभारने में
लगे हैं स्वार्थी लोग ..............
चेहरा बदलते
स्वार्थ की भूख पर करेगे
काबू
जब संतोष को धन
मानेगे
दर्द का रिश्ता सवारेगे
चौखट से दूर नहीं
भागेगा लोभ
काल के गाल पर
अमर हो जायेगे
पर-पीड़ा में हाथ
बढ़ाते लोग .................नन्द लाल भारती ......१९.०१.२०१२
बेटी
रुढ़िवादी धारणाये
सोच बदल डालो
मिलेगा सकून
धुल जाएगी मेल
एहसास प्रसून सा
देखना......
बेटी जहां की सांस
समझना
बढ़ रही है
क्यों रोकना
बेटी की उड़ान में
स्व-मान देखना...........
भ्रूण हत्या-भेदभाव
दहेज़ दूसरी
और
महामारियों को प्यारे
महापाप समझना
बेटी में शशि ,सूर्य कि ताकत
धरती का उपहार देखना ........नन्द लाल भारती .....२०.०१.२०१२
Wednesday, December 21, 2011
छोटी कवितायें ................
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