Friday, May 9, 2014

फ़र्ज़ पर फना हुये जा रहा हूँ /कविता

फ़र्ज़ पर फना हुये जा रहा हूँ /कविता
वही खौफ डंसता रहता है
जहां उम्र के बीते मधुमास
लगना तो चाहिए  था स्वर्णिम अच्छा
पर ऐसा नहीं हो सका,
अपनी  भेद भरी जहां  मे।
चाहा था जोड़ लूंगा स्वर्णिम रिश्ता तालीम ,
लगन और कर्म से
गढ़ दूंगा पहचान था विश्वास
खौफ के साये, टूटती चली जा  रही आस ।
महत्व ,गतिशीलता और उद्देश्य
नहीं निखर सके योग्य होकर भी
ऐसे में कैसे,
अच्छा लग सकता है
जिम्मेदारियां  है मज़बूरियां है
भेद भरी अपनी जहॉ मे जीने की,
तभी तो खौफ मे ,
जीवन के  मधुमास का ज़ारी है   हवन
पल-पल भेद का विषपान करते हुये भी।
जानता हूँ पहचानता हूँ
पीछे के भयावह कब्रस्तान को
आगे आग उगलते रेगिस्तान को
जहां कर्म योग्यता तालीम को मान नही
वर्ण के नाम बदनाम वही
विशेषता श्रेष्ठता पहचान वर्णिक अभिमान
यही ठगा -ठगा संघर्षरत हूँ
जहा उम्र के मधुमास हुये विरान
वही फ़र्ज़ पर फना हुये जा रहा हूँ
डॉ नन्द लाल भारती
15 -एम  वीणा नगर ,इंदौर -452010
  10 मई  2014

संकल्प/कविता 
नित बे-मौत मरते सपनो
का बोझ थामे
कल की अभिलाषा मे ,जहां खड़ा पड़ा हूँ ,
उम्र के दर्जनों बसंत विरान हुये है वही
विक्षिप्त भी बुध्दिमान हुये और
ऊपर तक उठ गये वही,
अयोग्य योग्य हुए योग्य तो तरक्कियो पर
कब्जा तक कर लिये जैसे
जातीय योग्यता के तड़के से ,
ऐसा नहीं कि मै अयोग्य हू
तालीम,योग्यता ,बाह्य दुनिया के
दिए गए मान-सम्मान की पूँजी भी है
मेरे पास वही मेरी ताकत
फ़र्ज़ पर फना होने का हौशला भी
फिर भी अयोग्य हो गया हू ,
अपनी जहां मे शोषित पीड़ित
तरक्की से दूर फेंका हाशिये का
आदमी हो गया हूँ
इस सब की पुख्ता वजह भी है
वर्णिक बूढ़ी कुव्यवस्था ,
इस कुव्यवस्था  और इसके पहरेदारों ने
छिन लिय है आदमी होने का सुख
छाती पर रख दिया टनो बोझ
शोषण ,अत्याचार ,गरीबी ,भूमिहीनता
बेरोजगारी और जातिवाद का
दहकता हुआ दर्द
फिर भी मै और मेरी अभिलाषा 
जीवित है और रहेगी
क्योंकि शिक्षित हूँ संघर्षरत हू
यही मेरा संकल्प है वही मै भी  हूँ …………
डॉ नन्द लाल भारती
15 -एम  वीणा नगर ,इंदौर -452010
9 मई  2014


उत्थान की दास्ताँ गढ़ने दे /कविता
बंद मुट्ठियाँ  फ़ैलने क्या लगी ,
कि
मुर्दाखोर दृष्टि बिछाने मे ,
जुट गयीं जाल ,
लाख उद्यम के बाद भी
 सुरक्षित नहीं  रहा अपनी जहाँ मे ,
मान-सम्मान और अधिकार
लूट गये हक और नसीब भी
दमन ,शोषण के
तमाम औजारो के साथ
तन गयी
आदमियत विरोधी सरहदें भी
फैलती हथेलियों पर
धार्मिक सुलगते सलाखों से
लगा  दिया गया ,
अछूत होने का ठप्पा
उद्यम के माथे थम गयी बदनसीबी
ताकि बनी रहे सत्ता
भय-भ्रम -भूख के चक्रव्यूह मे
फंसे शोषित हाशिये के अछूत  लोग
बने रहे गुलाम
ये अपनी जहां वालो
अब तो आगे आओ
बंद मुट्ठियों को फ़ैलने दे
उत्थान की दास्ताँ गढ़ने दे
वक्त आ गया है
आदमी को आदमी समझने का
तोड़ने का सामाजिक-आर्थिक
विषमता की हर सरहदे
उत्थान की दास्ताँ गढ़ने दे ..........
डॉ नन्द लाल भारती
 15 -एम  वीणा नगर ,इंदौर -452010
7  मई  2014

Thursday, May 8, 2014

उत्थान की दास्ताँ गढ़ने दे /कविता

उत्थान की दास्ताँ गढ़ने दे /कविता
बंद मुट्ठियाँ  फ़ैलने क्या लगी ,
कि
मुर्दाखोर दृष्टि बिछाने मे ,
जुट गयीं जाल ,
लाख उद्यम के बाद भी
 सुरक्षित नहीं  रहा अपनी जहाँ मे ,
मान-सम्मान और अधिकार
लूट गये हक और नसीब भी
दमन ,शोषण के
तमाम औजारो के साथ
तन गयी
आदमियत विरोधी सरहदें भी
फैलती हथेलियों पर
धार्मिक सुलगते सलाखों से
लगा  दिया गया ,
अछूत होने का ठप्पा
उद्यम के माथे थम गयी बदनसीबी
ताकि बनी रहे सत्ता
भय-भ्रम -भूख के चक्रव्यूह मे
फंसे शोषित हाशिये के अछूत  लोग
बने रहे गुलाम
ये अपनी जहां वालो
अब तो आगे आओ
बंद मुट्ठियों को फ़ैलने दे
उत्थान की दास्ताँ गढ़ने दे
वक्त आ गया है
आदमी को आदमी समझने का
तोड़ने का सामाजिक-आर्थिक
विषमता की हर सरहदे
उत्थान की दास्ताँ गढ़ने दे ..........
डॉ नन्द लाल भारती
 15 -एम  वीणा नगर ,इंदौर -452010
7  मई  2014

Monday, April 14, 2014

उध्दार दिवस /कविता ( अम्बेडकर जयंती विशेष )

उध्दार दिवस /कविता

( अम्बेडकर जयंती विशेष )
बाबा तेरा आना हो गया मंगलकारी
जय भीम संस्कार दुआ सलाम हितकारी
टूट गया जाति भेद का किला भयावह ,
आज़ाद कैद नसीब निखार  आया ,
शोषित कर्मवीर श्रमवीर उठ खड़ा हुआ
छाती तान है बोला
इंसान सच्चे संस्कृति प्रकृति ,
देश की सांस ,सांस हमारी
बाबा तेरा आना हुआ मंगलकारी……।
बाबा तेरा प्रताप नोचे पर  पाये
उड़ान भरने को आगे-आगे धाए
संविधान श्रेष्ठ राष्ट्र धर्म ग्रन्थ हमारा ,
शोषित और आधी आबादी का,
 स्व-मान बढ़ाया
बाबा तेरा संघर्ष हुआ कल्याणकारी
बाबा तेरा आना हुआ मंगलकारी…………………
बाबा तुम ना होते तो ,
जातिभेद का चक्रव्यूह कैसे  टूटता  ?
 अपनी जहां में होते बेगाने परिंदे ,
शोषण ,जुल्म ,अत्याचार ,दहकता दर्द ,
अपमान ही मिलता
शोषितो का उत्थान नारी को सम्मान
बाबा तेरे संघर्ष की नेक कमाई
उध्दार दिवस चौदह अप्रैल
डॉ भीम राव अम्बेडकर जयंती
शोषित जन बांटे मन-मन भर बधाई
राष्ट्र गौरान्वित विश्व हर्षाया
चौखट -चौखट  छाई उजियारी
जय भीम संस्कार दुआ सलाम हितकारी
बाबा तेरा आना हो गया मंगलकारी …………
डॉ नन्द लाल भारती 12 .04  2014.

अम्बेडकर जयंती ..........

अम्बेडकर जयंती  ..........
देवदूत भारत रत्न डॉ भीम राव अम्बेडकर ,
राष्ट्र के गौरव, बहुजन हिताय ,
बहुजन सुखाय के राही ,
संकटमोचन दुखहर्ता
शोषित समाज के
नयंनज्योति-मसीहा
बाबा का जीवन संघर्ष ,
अछूत ,हाशिये के आदमी ,
कमेरी दुनिया के लोगो
आम आदमी ,नारी उध्दार
और सफल मनोकामना ,
14 अप्रैल उध्दार दिवस,
स्वाभिमान दिवस ,
सौभाग्य दिवस
अरुणोदय  नव -नव ,
मंगल  प्रभात
 जय भीम कायनात
14 अप्रैल अम्बेडकर जयंती  की
 ढेरो बधाई
अनंत मंगलकामना … डॉ नन्द लाल भारती
13  .04  2014.


नास्तिक/कविता

नास्तिक/कविता
माना कि अपनी जहां   में
नास्तिक हो गया हूँ ,
खैर नास्तिक होने की पुख्ता
वजहें भी तो हैं ,
 आस्तिक होने से मिला क्या……?
यही ना छल ,दंड ,भेद ,
सुलगता हुआ जख्म
दहकता हुआ दर्द ,
अहकता हुआ मन ,
झंझावाते अनेको ,छुआछूत
जातिवाद ,नफ़रत
उत्पीड़न ,आदमी होने के सुख से बेदखली
कैद नसीब के मालिक होने का दर्द।
आस्तिक हूँ, आस्थावान हूँ
 मानवता के प्रति ,
दर्द के रिश्ते के प्रति
देश  कायनात के प्रति
और
एक ईश्वरीय सत्ता के प्रति भी
सच यही मेरी  नास्तिकता है
अपनी जहां में
प्रज्जवलित है जो
अप्पो दीपो भवः की तेल बाती से ..........
डॉ नन्द लाल भारती 15 .04  2014.



Tuesday, April 1, 2014

भेदभाव की तपती लू /कविता

भेदभाव की तपती लू /कविता
आहत आज स्वर्णिम आभा की ,
आग उगलती लू से ,
सच यही लू
राख कर रही है सदियों से
हक़ ,कर्म-श्रम- सृजन
और कुछ अपनी जहां में..........
मुखौटाधारी रोप रहे हैं
जातीय-भेद नफ़रत ,भ्रष्ट्राचार
साजिश दगाबाजी की विषबेल
दिल पर जमी उनके
सदियो पुरानी मेल
दमन की आग उगलती रहती है ………
विषबेल रोपने वाले,धोखा देने वाले
आदमियत का क़त्ल करने वाले
चढ़ते जा रहे है शिखर
हड़फोड़ाने वाला जिसकी जहां
जिसका हक़ वही
प्यासी निगाहों से ताक रहा
अपनी जहां में…………।
भेद शोषण अत्याचार की आग
उगलती लू
लहुलुहान किये रहती है
कमजोर नीचले तबके के आदमी का जीवन
और तबाह होता रहता है
कल भी अपनी जहां में ………।
यही है वह आग सदियों पुरानी
स्वाहा कर रही है जो
हाशिये के आदमी की तरक्की
और आदमी होने का सुख भी
बो रही हा दमन के बीज निरंतर
सच आज की स्वर्णिम आभा में भी
शोषित दमित अहक-अहक दहक रहे
भेदभाव की तपती लू से ,
आज भी अपनी जहां में। …………
डॉ नन्द लाल भारती 01 .04 2014.