आदमी गरीब नहीं होता
बना दिया जाता है
मौके छीन लिए जाते है
दिला दी जाती है
गरीब
हो कि कसम
गर मिल जाती
अच्छी तालीम
विकास की राह
चलने का मौका
बदल जाती
ठगी तकदीर
काश ऐसा हो जाता
तो
रोशन हो जाता
गरीब का जहा भी .........नन्द लाल भारती २८.०६.2011
Tuesday, June 28, 2011
बदले दौर में
बदल दौर में जोगी बदल रहे
कहा टिके यकीन बाबा
क्रांति का बजा
तो
बिगुल
खुद के बचाव के लिए
महिलावेष धर निकल गए
बाबाओ के किले डकार रहे
ट्रको सोने कि सिल्लिया
और
नोटों कि गड्डियां
देश में होगे ऐसे
बाबा तो क्या होगा .....?
गरीब और गरीब
विकास पर ग्रहण
समझ में आ गया
स्वार्थ में डूबे
और
राजनीती कि सरिता में नहाए
जोगी हो या भोगी
सब आमआदमी
और
देश को छल रहे .................नन्द लाल भारती २८.०६.2011
कहा टिके यकीन बाबा
क्रांति का बजा
तो
बिगुल
खुद के बचाव के लिए
महिलावेष धर निकल गए
बाबाओ के किले डकार रहे
ट्रको सोने कि सिल्लिया
और
नोटों कि गड्डियां
देश में होगे ऐसे
बाबा तो क्या होगा .....?
गरीब और गरीब
विकास पर ग्रहण
समझ में आ गया
स्वार्थ में डूबे
और
राजनीती कि सरिता में नहाए
जोगी हो या भोगी
सब आमआदमी
और
देश को छल रहे .................नन्द लाल भारती २८.०६.2011
Thursday, June 16, 2011
प्रसून-कविता
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कविता-५
आदमी हूँ
मेरा भाग्य है ,
कलमकार हूँ
सौभाग्य है
योग्य-कर्मशील हूँ
जीवन संघर्ष का
प्रतीक है
पद और दौलत से
वंचित हूँ
आदमी का दिया
दुर्भाग्य है
दुर्भाग्य को
लहूलुहान कर
देते है
उच्च-श्रेष्ठ -दबंग
कुछ लोग
छाती में
खंजर उतार कर
यही विष बीज
कर देता है
वंचित
आदमी की
तकदीर
बंजर
यही जीवन
जीने का सलीका
दर्द कहे
या
कराहते
जीवन जंग में
बढ़ते रहने का
जनून
यही
भोग रहा हूँ
कलमकार हूँ
सौभाग्य
कह
रहा हूँ ......नन्द लाल भारती ... १६.०६.२०११
मेरा भाग्य है ,
कलमकार हूँ
सौभाग्य है
योग्य-कर्मशील हूँ
जीवन संघर्ष का
प्रतीक है
पद और दौलत से
वंचित हूँ
आदमी का दिया
दुर्भाग्य है
दुर्भाग्य को
लहूलुहान कर
देते है
उच्च-श्रेष्ठ -दबंग
कुछ लोग
छाती में
खंजर उतार कर
यही विष बीज
कर देता है
वंचित
आदमी की
तकदीर
बंजर
यही जीवन
जीने का सलीका
दर्द कहे
या
कराहते
जीवन जंग में
बढ़ते रहने का
जनून
यही
भोग रहा हूँ
कलमकार हूँ
सौभाग्य
कह
रहा हूँ ......नन्द लाल भारती ... १६.०६.२०११
कविता -4
सत्ता की परछाईया
चाटकर
गली के
स्वान
उगल रहे
अभिमान
खुद को
राजा
गरीब को प्रजा
कह रहे है ,
बेदखली का
कैसा जनून
रूप धर कर
श्रम-फल-हक़
तक
चट कर रहे है ....नन्द लाल भारती १६.०६.२०११
चाटकर
गली के
स्वान
उगल रहे
अभिमान
खुद को
राजा
गरीब को प्रजा
कह रहे है ,
बेदखली का
कैसा जनून
रूप धर कर
श्रम-फल-हक़
तक
चट कर रहे है ....नन्द लाल भारती १६.०६.२०११
कविता -3
अरमान के
जंगल में
ठूठ सपनों के
विहड़ खड़े है
श्रम की लाठी से
खून होता
पसीना
खुली आँखों के
सपने
भ्रष्ट्राचार के पाँव तले
दफ़न हो रहे है
गरीब की तार-तार
नईया
परिश्रम की पतवार से
किनारा ढूढ़
रही है ...नन्द लाल भारती॥ १६.०६.२०११
जंगल में
ठूठ सपनों के
विहड़ खड़े है
श्रम की लाठी से
खून होता
पसीना
खुली आँखों के
सपने
भ्रष्ट्राचार के पाँव तले
दफ़न हो रहे है
गरीब की तार-तार
नईया
परिश्रम की पतवार से
किनारा ढूढ़
रही है ...नन्द लाल भारती॥ १६.०६.२०११
कविता-- 2
क्षेत्रवाद ,
भेदभाव के
ठीहे पर
लूट गया
तकदीर का
सितारा
बड़े अरमान थे
प्यारे
तालीम सपने
भरपूर
जन्मदाती
बूढी आँखों के भी
डूब गए सपने
ना समझ पाया
कौन सी
सजा का बोझ
ढो रहा
बेकसूर.................नन्द लाल भारती ॥ १६.०६.२०११
भेदभाव के
ठीहे पर
लूट गया
तकदीर का
सितारा
बड़े अरमान थे
प्यारे
तालीम सपने
भरपूर
जन्मदाती
बूढी आँखों के भी
डूब गए सपने
ना समझ पाया
कौन सी
सजा का बोझ
ढो रहा
बेकसूर.................नन्द लाल भारती ॥ १६.०६.२०११
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