Monday, September 13, 2010

राह जाना है

राह जाना है ..
ये दीप आंधियो के प्रहार से
थकने लगा है ,
खुली आँखों के सपने
लगे है धुधले .
हारने लगी है अब उम्मीदे
भविष्य के रूप लगने लगे है
कारे-कारे ।
लगने लगा है
होंठ गए हो सील
पलको पर आंसू लगें है
पलने ।
वेदना के जल , उम्मीद के बादल
लेकर लगे है चलने ।
थामे करुणा कर
जीवन पथ पर निकल पड़ा
पहचान लिया जग को
यह दीप थका ।
उम्र के उडते पल
पसीने की धार झराझर
फल दूर नित दूर होता रहा
सुधि से सुवासित
दर्द से कराहता रहा ।
कर्म के अवलंबन को
ज्वाला का चुम्बन
डंस गया
घायल मन के
सूने कोने में
आहत सांस भरता गया ।
भेद की ज्वाला ने किया
तबाह
पत्थर पर सिर पटकते
दिन गुजर रहा
घेरा तिमिर
बार-बार
संकल्प दोहराता रहा ।
जीवन का स्पंदन
चिर व्यथा को जाना ।
दहकती ज्वाला की छाती पर
चिन्ह है बनाना
याद बिखरे विस्मृत,
क्षार सार माथे मढ़ जाना
छाती का दर्द
भेद के भूकम्प का आ जाना
कब लौटेगे दिन
कब सच होगा
पसीने का झरते जाना
उर में अपने पावस
जीवन का उद्देश्य
आदमियत की राह है जाना ..... नन्दलाल भारती १३.०९.२०१०

2 comments:

  1. दहकती ज्वाला की छाती पर
    चिन्ह है बनाना
    याद बिखरे विस्मृत,
    क्षार सार माथे मढ़ जाना
    छाती का दर्द
    भेद के भूकम्प का आ जाना
    कब लौटेगे दिन
    कब सच होगा
    पसीने का झरते जाना
    उर में अपने पावस
    जीवन का उद्देश्य
    आदमियत की राह है जाना....

    बहुत उम्दा रचना...बधाई

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