Sunday, September 19, 2010

धरती का साज

धरती का साज
नारी जीवन विरह का
पर्याय नहीं ,
परमार्थ की सौगात
उत्पीडन का जीव नहीं ।
नयनो में आंसू अथाह
उर से बरसे
वचन महान
पग पड़े जहा,
वहा सम्व्रिधि के बने
निशान ।
नारी जीवन न्यौछावर
और
सौगात ,
खुद से बेखबर
परिवार की फिक्र में
बोती आस।
होंठो पर मुस्कान
पलको पर आंसू के
हार,
व्यथा का बोझ भरी
नारी जाती
जीत-जीत कर हार ।
पुलकित जग
ममता की निर्मल छांव
धरती की साज
नारी
कुसुमित परिवार
जहा -जहा
पड़े तेरे पाँव .......नन्दलाल भारती ... १९.०९.२०१०





1 comment:

  1. वाह नंदलाल जी नारी के हर रूप झलकते हैं इस कविता में ।।। शुभकामनाएं

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