Tuesday, August 31, 2010

अमर गीत

अमर गीत ..
गंगाजल सरीखे
आँखों के पानी
का मोल,
आदमी रूप खुदा का
मन की गहराई से तोल ।
बहते आंसू को पोंछ ,
कमजोर के काम
आया जो ,
जगाया जज्बात
नेक देवतुल्य
सच्चा इंसान है वो ।
मर मिट जायेगे
सब पीछे
भी तो
यही हुआ ,
किया काम कल्याण का
आदमी
वही
खुदा हुआ ।
माया के हुश्न
तरबत्तर दीन को
सताया ,
वक्त ने दुत्कारा
ना
कभी जमाने को
याद आया ।
वक्त ने बिन पानी की
मीन सा तड़पाया ,
तानाशाहों ने भी
कफ़न
तक नहीं पाया ।
आदमी खुदा का रूप
उजियारा,
उठे हर हाथ
चिराग
मिटे हर अँधियारा ।
कृष्ण किये उध्दार
राम हुए पुरुषोत्तम
महावीर अहिंसा
बुध्द ने जलाई
समता की ज्योति
सर्वोत्तम ।
कबीर रविदास के शब्द
ललकार रहे ,
गूंज रही मीरा की धुनें ,
वाहे गुरु
अनुराग रहे ।
ध्रितराष्ट्र को जग
धिक्कार रहा ।
ना तडपे भविष्य
ना आँखे
अब रोये
लिख दो
अमर गीत भारती
समय के आरपार
जग वाले गाए..........नन्दलाल भारती ३१.०८.२०१०

2 comments:

  1. अच्छी पंक्तिया है ....
    http://thodamuskurakardekho.blogspot.com

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  2. वाह नंदलाल जी, रोंगटे खड़े हो गए

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